नमस्ते, बोधि मित्र में आप सभी का स्वागत है। और आज हम चर्चा करेंगे कि यह 'मैं' क्या है। तो वैसे तो दो प्रकार के 'मैं' माने गए हैं।
एक वह जो मिथ्या 'मैं' है, जिससे कि सभी परिचित हैं, जिसके बारे में सभी जानते हैं। और जो दूसरा 'मैं' है, उसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता और उसके बारे में कोई कुछ जान भी नहीं सकता।
जिस 'मैं' के बारे में सबको पता है, वह झूठ है, वह एक किस्म का भ्रम है। लेकिन बड़े मज़े की बात है कि हमने उसी को सत्य मान लिया है। और जो सत्य 'मैं' है, उसके बारे में हमें कोई खबर नहीं है; हम उसके बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं।
मिथ्या 'मैं' का स्वरूप
यह जो मिथ्या 'मैं' है, वह एक संस्था है जो बहुत सी चीजों से मिलकर बना है। इसका आधार हमेशा दूसरों पर खड़ा है, बाहर की ओर आरोपित है। और यह बना है:
संबंधों से, परिवारों से
धन से, संपत्ति से
रिश्ते-नाते, पद, जाति और धर्म से
रंग से, शरीर और शरीर के अंगों से
राष्ट्र, समय, वाणी और संस्कारों से
संस्कृति और वेशभूषा से
भावनाओं, इच्छाओं, बुद्धि, नियम और विचारों से
स्मृति और लिंग से
यह अपनी पहचान इन्हीं सब से बनाता है। इसकी दौड़ हमेशा बाहर की ओर है और यह अपने आप में कुछ भी नहीं है। यह अकेला जीवित नहीं रह सकता।
शून्य स्वरूप की खोज
एक बड़ी आश्चर्यजनक बात है कि यह जो 'मैं-मैं' करता है, यदि हम इसे खोजने चलें, तो यह अकेला कहीं नहीं मिलता, हमेशा समूह में ही मिलता है। तो ये जितने भी हमने गिनाए हैं, ये सब इसके आधार हैं। यदि हम इसके आधार को परत-दर-परत गिराते चले जाएं, तो अंत में यह स्वयं ही नष्ट हो जाता है और अपने शून्य स्वरूप में विलीन हो जाता है।
यहाँ नष्ट हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि यह कहीं चला जाएगा या इसमें आग लग जाएगी। यहाँ नष्ट होने का अर्थ है— इसकी मिथ्या को जान लेना। वह जैसा है, वैसा दिख जाना।
सत्य 'मैं' का प्रकाश
जब हम इसकी मिथ्या को जान जाते हैं, तो वह जो सूर्य रूपी 'मैं' है, वह स्व-प्रकाशित होता है। वह अपने आप दिख जाता है, उसके लिए कुछ करना नहीं पड़ता।
यह ऐसा ही है जैसे किसी तालाब के गर्भ में हीरे-जवाहरात छुपे हों, लेकिन पानी मटमैला होने के कारण हमें कुछ भी दिखाई नहीं देता। जब हम तालाब को खाली करना शुरू करते हैं, तो उसके भीतर का खजाना हमें दिखने लगता है। इसी तरह, यदि कोई 'हीरा' पाना चाहता है, तो उसे 'मैं' रूपी मटमैले पानी को बाहर निकालकर खाली होना ही होगा। तभी वह दिखेगा।
निष्कर्ष
जब इस ('मैं') का नाश होना शुरू होता है, तो सूर्य की किरण धीरे-धीरे उतरना शुरू होती है। ऐसा कहना भी ठीक नहीं है कि उसका अवतरण होता है; वह तो अवतरित ही है, वह तो स्व-प्रकाशित ही है। केवल 'मैं' नाम की मिट्टी उस पर जमी है।
यदि इस चित्त की खिड़की पर से जमी हुई धूल को हम झाड़ना शुरू करें, तो चेतना का प्रकाश भीतर प्रवेश करने लगता है। काम कुछ भी नहीं है— केवल मिट्टी हटाना है, कीचड़ हटाना है, धूल झाड़ना है। काम बहुत छोटा सा है, लेकिन है बहुत कठिन।
और जब संपूर्ण 'मैं' नाम की संस्था का नाश हो जाता है, तो केवल शुद्ध 'मैं' ही बचता है। उसे कहा नहीं जा सकता, उसे कहने का कोई उपाय नहीं है। वह तो केवल 'हुआ' जा सकता है।
पर्दा गिरते ही सूर्य प्रकाशित होता है। यही हम सबका स्वभाव है। यही आप हो, यही मैं हूँ और यही आनंद है।
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